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द्रोण पर्व
अध्याय २१
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धृतराष्ट्र उवाच
स हि वीरो नरः सूत यो भग्नेषु निवर्तते |  ३   क
अहो नासीत्पुमान्कश्चिद्दृष्ट्वा द्रोणं व्यवस्थितम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति