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वन पर्व
अध्याय ५२
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वृहदश्व उवाच
कस्त्वं सर्वानवद्याङ्ग मम हृच्छय़वर्धन |  १९   क
प्राप्तोऽस्यमरवद्वीर ज्ञातुमिच्छामि तेऽनघ ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति