उद्योग पर्व  अध्याय १७

अगस्त्य उवाच

एवं भ्रष्टो दुरात्मा स देवराज्यादरिन्दम |  १६   क
दिष्ट्या वर्धामहे शक्र हतो व्राह्मणकण्टकः ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति