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वन पर्व
अध्याय ५२
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वृहदश्व उवाच
स वै त्वमागतानस्मान्दमय़न्त्यै निवेदय़ |  ५   क
लोकपालाः सहेन्द्रास्त्वां समाय़ान्ति दिदृक्षवः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति