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विराट पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
पार्थोऽपि विश्रुतं लोके गाण्डीवं परमाय़ुधम् |  ३   क
विकृष्य चिक्षेप वहून्नाराचान्मर्मभेदिनः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति