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विराट पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कनकपुङ्खाग्रैर्वीरः संनतपर्वभिः |  ८   क
त्वरन्गाण्डीवनिर्मुक्तैरर्जुनस्तस्य वाजिनः |  ८   ख
चतुर्भिश्चतुरस्तीक्ष्णैरविध्यत्परमेषुभिः ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति