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शान्ति पर्व
अध्याय २६१
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कपिल उवाच
यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः प्रकृतेः स्याद्वशानुगः |  ५१   क
तस्य द्वेषश्च कामश्च क्रोधो दम्भोऽनृतं मदः |  ५१   ख
नित्यमेवाभिवर्तन्ते गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ||  ५१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति