उद्योग पर्व  अध्याय ५२

धृतराष्ट्र उवाच

दर्शनीय़ो मनस्वी च लक्ष्मीवान्व्रह्मवर्चसी |  ८   क
मेधावी सुकृतप्रज्ञो धर्मात्मा पाण्डुनन्दनः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति