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द्रोण पर्व
अध्याय ५२
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सञ्जय़ उवाच
अभिमन्योः पितुर्भीतः सव्रीडो वाक्यमव्रवीत् |  ४   क
योऽसौ पाण्डोः किल क्षेत्रे जातः शक्रेण कामिना ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति