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द्रोण पर्व
अध्याय ५२
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सञ्जय़ उवाच
स निनीषति दुर्वुद्धिर्मां किलैकं यमक्षय़म् |  ५   क
तत्स्वस्ति वोऽस्तु यास्यामि स्वगृहं जीवितेप्सय़ा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति