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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम् |  ९७   क
रत्नाकरममित्रघ्न निधानं पय़सो महत् ||  ९७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति