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कर्ण पर्व
अध्याय ५२
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सञ्जय़ उवाच
योऽसौ रणे नरं नान्यं पृथिव्यामभिमन्यते |  १४   क
तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पास्यति शोणितम् |  १४   ख
गाण्डीवसृष्टा दास्यन्ति कर्णस्य परमां गतिम् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति