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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
ते विशीर्णरथाश्वेभाः प्राय़शश्च पराङ्मुखाः |  ४९   क
कुरवः कर्ण कर्णेति हा हेति च विचुक्रुशुः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति