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कर्ण पर्व
अध्याय ५२
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सञ्जय़ उवाच
धनुर्वेदे मत्समो नास्ति लोके; पराक्रमे वा मम कोऽस्ति तुल्यः |  ३०   क
को वाप्यन्यो मत्समोऽस्ति क्षमाय़ां; तथा क्रोधे सदृशोऽन्यो न मेऽस्ति ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति