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कर्ण पर्व
अध्याय ५२
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सञ्जय़ उवाच
शरार्चिषा गाण्डिवेनाहमेकः; सर्वान्कुरून्वाह्लिकांश्चाभिपत्य |  ३२   क
हिमात्यये कक्षगतो यथाग्नि; स्तहा दहेय़ं सगणान्प्रसह्य ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति