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शल्य पर्व
अध्याय ५२
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कुरुरु उवाच
अपि चात्र स्वय़ं शक्रो जगौ गाथां सुराधिपः |  १७   क
कुरुक्षेत्रे निवद्धां वै तां शृणुष्व हलाय़ुध ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति