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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
अविन्ध्यो हि महावाहो राक्षसो वृद्धसंमतः |  ६५   क
कथितस्तेन सुग्रीवस्त्वद्विधैः सचिवैर्वृतः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति