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शल्य पर्व
अध्याय ५२
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ऋषय़ ऊचुः
किमिदं वर्तते राजन्प्रय़त्नेन परेण च |  ५   क
राजर्षे किमभिप्रेतं येनेय़ं कृष्यते क्षितिः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति