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आदि पर्व
अध्याय ५३
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सूत उवाच
असितं चार्तिमन्तं च सुनीथं चापि यः स्मरेत् |  २३   क
दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्य सर्पभय़ं भवेत् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति