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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
मत्स्येवोदकमन्वेति प्रवर्तति प्रवर्तनात् |  ७२   क
यथैव वुध्यते मत्स्यस्तथैषोऽप्यनुवुध्यते |  ७२   ख
सस्नेहः सहवासाच्च साभिमानश्च नित्यशः ||  ७२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति