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आदि पर्व
अध्याय ५३
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सूत उवाच
हूय़माने भृशं दीप्ते विधिवत्पावके तदा |  ३   क
न स्म स प्रापतद्वह्नौ तक्षको भय़पीडितः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति