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आदि पर्व
अध्याय ५३
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शौनक उवाच
किं सूत तेषां विप्राणां मन्त्रग्रामो मनीषिणाम् |  ४   क
न प्रत्यभात्तदाग्नौ यन्न पपात स तक्षकः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति