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आदि पर्व
अध्याय ५३
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सूत उवाच
वितस्थे सोऽन्तरिक्षेऽथ हृदय़ेन विदूय़ता |  ६   क
यथा तिष्ठेत वै कश्चिद्गोचक्रस्यान्तरा नरः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति