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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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युधिष्ठिर उवाच
न च पीडय़ितव्यो मे भीष्मो धर्मभृतां वरः |  १५   क
अतः पुरःसराश्चापि निवर्तन्तु धनञ्जय़ ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति