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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
रथस्थाः संविदं कृत्वा सुखां पृष्ट्वा च शर्वरीम् |  २०   क
मेघघोषै रथवरैः प्रय़युस्ते महारथाः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति