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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
मेघपुष्पं वलाहं च सैन्यं सुग्रीवमेव च |  २१   क
दारुकश्चोदय़ामास वासुदेवस्य वाजिनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति