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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ते हय़ा वासुदेवस्य दारुकेण प्रचोदिताः |  २२   क
गां खुराग्रैस्तथा राजँल्लिखन्तः प्रय़युस्तदा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति