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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ |  ८   क
अविज्ञानादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति