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शान्ति पर्व
अध्याय १०३
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भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तविधिं चात्र जपहोमांश्च तद्विदः |  ४   क
मङ्गलानि च कुर्वन्तः शमय़न्त्यहितान्यपि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति