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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वकर्मनिरताश्चासन्सर्वे वर्णा नराधिप |  २२   क
एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न ह्रसते क्वचित् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति