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अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
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भीष्म उवाच
यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षय़ामास भार्गवः |  ११   क
तत उत्थाय़ सहसा स्नानशालां विवेश ह |  ११   ख
कॢप्तमेव तु तत्रासीत्स्नानीय़ं पार्थिवोचितम् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति