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अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
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भीष्म उवाच
अथ सर्वमुपन्यस्तमग्रतश्च्यवनस्य तत् |  २०   क
ततः सर्वं समानीय़ तच्च शय़्यासनं मुनिः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति