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अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
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भीष्म उवाच
तत्रैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा |  २३   क
सभार्यो वाग्यतः श्रीमान्न च तं कोप आविशत् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति