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उद्योग पर्व
अध्याय १७
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अगस्त्य उवाच
ध्वंस पाप परिभ्रष्टः क्षीणपुण्यो महीतलम् |  १५   क
दश वर्षसहस्राणि सर्परूपधरो महान् |  १५   ख
विचरिष्यसि पूर्णेषु पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति