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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
उच्चावचं दैवय़ुक्तं रहस्यं; दिव्याः प्रश्ना मृगचक्रा मुहूर्ताः |  ९३   क
क्षय़ं महान्तं कुरुसृञ्जय़ानां; निवेदय़न्ते पाण्डवानां जय़ं च ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति