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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
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वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रिय़ाणि च सर्वाणि वाजिवत्परिपालय़ |  १३   क
हिताय़ वै भविष्यन्ति रक्षितं द्रविणं यथा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति