उद्योग पर्व  अध्याय ३६

हंस उवाच

न जीय़ते नोत जिगीषतेऽन्या; न्न वैरकृच्चाप्रतिघातकश्च |  १५   क
निन्दाप्रशंसासु समस्वभावो; न शोचते हृष्यति नैव चाय़म् ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति