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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
विश्वामित्रस्तु कृत्वेष्टिं सप्तर्षीणां महामुनिः |  ७   क
पावकं कामसन्तप्तमदृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् |  ७   ख
तत्तेन निखिलं सर्वमववुद्धं यथातथम् ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति