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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
अहं विष्णुरहं व्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः |  १४   क
भूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति