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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमप्युत |  १५   क
धर्मस्य सेतुं वध्नामि चलिते चलिते युगे |  १५   ख
तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति