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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
यदा गन्धर्वय़ोनौ तु वर्तामि भृगुनन्दन |  १७   क
तदा गन्धर्ववच्चेष्टाः सर्वाश्चेष्टामि भार्गव ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति