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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
नागय़ोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत् |  १८   क
यक्षराक्षसय़ोनीश्च यथावद्विचराम्यहम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति