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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
तथा दैत्यगणान्सर्वान्यक्षराक्षसपन्नगान् |  ४   क
गन्धर्वाप्सरसश्चैव विद्धि मत्प्रभवान्द्विज ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति