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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
सदसच्चैव यत्प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च |  ५   क
अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति