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सभा पर्व
अध्याय ५३
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शकुनिरु उवाच
एवं त्वं मामिहाभ्येत्य निकृतिं यदि मन्यसे |  १२   क
देवनाद्विनिवर्तस्व यदि ते विद्यते भय़म् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति