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सभा पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
उपोह्यमाने द्यूते तु राजानः सर्व एव ते |  १७   क
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विविशुस्तां सभां ततः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति