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सभा पर्व
अध्याय ५३
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दुर्योधन उवाच
सन्ति मे मणय़श्चैव धनानि विविधानि च |  २४   क
मत्सरश्च न मेऽर्थेषु जय़ाम्येनं दुरोदरम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति