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सभा पर्व
अध्याय ५३
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युधिष्ठिर उवाच
न हि मानं प्रशंसन्ति निकृतौ कितवस्य ह |  ३   क
शकुने मैव नो जैषीरमार्गेण नृशंसवत् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति