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वन पर्व
अध्याय ५३
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वृहदश्व उवाच
सा नमस्कृत्य देवेभ्यः प्रहस्य नलमव्रवीत् |  १   क
प्रणय़स्व यथाश्रद्धं राजन्किं करवाणि ते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति