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वन पर्व
अध्याय ५३
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वृहदश्व उवाच
तमपश्यंस्तथाय़ान्तं लोकपालाः सहेश्वराः |  १३   क
दृष्ट्वा चैनं ततोऽपृच्छन्वृत्तान्तं सर्वमेव तत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति